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neelamsingh


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जनतंत्र के गुमशुदा होने की रपट

Posted On: 25 Feb, 2012  
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शिक्षा की अनूठी हाट

Posted On: 6 Dec, 2011  
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इस इन्तेहा की हद को बार – बार देखिये

Posted On: 18 Oct, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय नीलम जी, सादर प्रणाम मंच पर नया हूँ और आपको प्रथम प्रतिक्रया दे रहा हूँ बहुत ही झुझारू कविता आपकी और प्रश्नों से भरी हुई उतर में देता हूँ "जनतंत्र हमारा सोया है वो दुह:स्वप्नों में खोया है, हम चीख-चीख चिल्लाते है, अपनी पीड़ा बतलाते है, वो सभी की चीखें सुन है रहा, अन्दर-अन्दर ही गम है सहा व्रण लगा है उसके सिने में, हमको किंचित भी नहीं दिखता हम लोभी है जो कोष रहें, क्यूँ कोई उसे नहीं सुनता अब देखो हमको ही उसको, इस हाल से बाहर लाना है इस सोये हुए जनतंत्र को अब, कुछ दवा-दारु करवाना है वो उठेगा जब धर रौद्र रूप, फिर कहाँ कोई बच पायेगा जो सीना ठोके लुट रहा, वो केवल गच्चा खायेगा" आभार सहित सुन्दर कविता के लिए आपको बधाई

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

प्रतिक्रिया के लिए आभार ! अपनी पोस्ट डिलीट करने का कारण मैं बताना तो नहीं चाहती थी पर आपने पूछा है और कई लोगों ने पहले भी पूछा था तो बताना मुनासिब समझती हूँ | जे . जे . से मैं आदरणीय आर . एन , शाही जी के कहने से जुड़ी | मुझे यहाँ सबका भरपूर प्यार भी मिला , उत्साह बना रहा और मैं लिखती रही पर ब्लागर आफ द वीक बनने के बाद मैंने नोटिस किया कि सबने रचनाओं की रेटिंग करनी बंद कर दी , सराहना मिलती रही पर ये बात मन को कचोटती थी एक दिन उसी मनःस्थिति में मैंने सारी रचनाएँ डिलीट कर दी | मेरा निर्णय सही नहीं था जानती हूँ पर अब कुछ किया नहीं जा सकता | मैं चाहकर भी व्यस्तता के कारण दूसरों की रचनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं दे पाती थी कारण यह भी हो सकता है |

के द्वारा:

के द्वारा: alkargupta1 alkargupta1




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