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जनतंत्र के गुमशुदा होने की रपट

Posted On: 25 Feb, 2012 में

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काठ के पुतलों !
एक कलम लिखवाना चाहती है
जनतंत्र के गुमशुदा होने की रपट
तुम बोलते क्यों नहीं ?
जब दिनकर ने पूछा था -
” अंटका कहाँ स्वराज
बोल दिल्ली तू क्या कहती है ,
तू रानी बन गई वेदना
जनता क्यों सहती है ? ”
तब भी तुम चुप रहे
ख़ामोश थी संसद भी
नहीं बताया उसने ‘ धूमिल ‘ को
रोटियों से खेलने वालों का नाम |
हर हत्या के बाद वीरान हुए आँगनों में
चमकने वाले चाँद को सबसे ख़तरनाक बताकर
जब ‘ पाश ‘ ने पेश किया था तुम्हारे सामने
तुम गूँगे बने रहे |
देश की जनता को भेड़ बकरियों की शक्ल लेते देख
संसद मुस्कुराती रही |
राजा ने रखवाली की
उल्लुओं , चमगादड़ों और गीदड़ों की
रात के अँधेरे में निकलने लगा
ज़िंदा रूहों का जुलूस |
कलमें डूबने लगीं शराबखोरी में
कलम के सिपाहियों को भाने लगीं रंगीन महफ़िलें
हमारे सबसे खूबसूरत सपने के मुँह पर
काला कपड़ा बाँध लटका दिया गया फाँसी पर
राजनीति वेश्या बन गई , कुर्सियाँ सर्वोच्च लक्ष्य
भांडों ने संभाली न्यायपालिका |
महामहिम !
बताइए , छटपटाती आत्मा का दर्द लेकर
वह आदमी कहाँ जाए जो बिकाऊ नहीं है ?
जिसके अनुत्तरित और आहत प्रश्नों की प्रतिध्वनि
लौटकर वापस आ जाती है हर बार ,
वह कलम क्या करे ?
जनतंत्र का खो जाना कोई मामूली घटना नहीं है
जिस जनतंत्र को हमने
अपने लहू का घूँट पिलाकर पाला है
उसे यूँ ही खोने नहीं देंगे
खुदाओं से कहो , वक्त है संभल जाएँ
स्वर्ग की सुकोमल शय्या पर
हम उन्हें और सोने नहीं देंगे |

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 27, 2012

सादर चरण स्पर्श, हैरान हूँ कि आपकी इस कृति पर मेरी नज़र कैसे नहीं पड़ी। आपकी किसी कविता की समीक्षा मेरी औक़ात के बाहर की चीज़ है। फिर भी ये ज़रूर कहना चाहूँगा कि आपकी कलम आपके चिरपरिचित तेवर में नज़र आ रही है। जनतंत्र के प्रति यह संकल्प तो हर भारतीय को लेना चाहिए। बहुतों के ज़मीर अभी तक सोये हुए हैं उन्हें झकझोर कर उठाना होगा। साभार,

    neelamsingh के द्वारा
    February 27, 2012

    धन्यवाद वाहिद भाई , आप बार बार ऐसा क्यों कहते हैं कि आपकी कविता की समीक्षा मैं नहीं लिख सकता , किसी कविता की भाव धारा को समझने वाला व्यक्ति उसपर टिप्पड़ी करने का हक़दार होता है | आपलोग भी तो मेरे ही पथ के साथी हैं , कुछ लोगों को भी हम जगा पाए तो लिखना सार्थक हुआ |

Rachna Varma के द्वारा
February 27, 2012

गुमशुदा जनतंत्र पर व्यंगात्मक प्रहार करती इस कविता की जितनी भी तारीफ की जाये कम है धन्यवाद

    neelamsingh के द्वारा
    February 27, 2012

    रचना जी प्रतिक्रिया के लिए आपकी आभारी हूँ | आप स्वयं बहुत अच्छा लिखती हैं और मुझसे भी ज्यादा प्रशंसा की अधिकारी हैं |

vinitashukla के द्वारा
February 26, 2012

एक बार फिर से तुम्हारी कलम ने, अपने बागी तेवरों से सबका दिल जीत लिया है. जनतंत्र को लूटतंत्र बनाने वालों को चुनौती देती हुई, एक बहुत ही सुन्दर रचना. जे. जे. पर पुनरागमन सुखद लगा. बधाई नीलम.

    neelamsingh के द्वारा
    February 26, 2012

    आदरणीय विनीता दी , चरण स्पर्श स्नेह से भरी इस प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ , अपना आशीर्वाद बनाये रखियेगा |

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 26, 2012

महामहिम ! बताइए , छटपटाती आत्मा का दर्द लेकर वह आदमी कहाँ जाए जो बिकाऊ नहीं है ? जिसके अनुत्तरित और आहत प्रश्नों की प्रतिध्वनि लौटकर वापस आ जाती है हर बार , वह कलम क्या करे ? aadarniya नीलम जी, saadar abhivadan इनके भी घर होते हैं इनका भी परिवार होता है छक्के छुट जाते दुश्मनों के जब कलमकार का वार होता है. वन्दे मातरम.

    neelamsingh के द्वारा
    February 26, 2012

    प्रदीप जी , प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद , आपकी काव्यात्मक पंक्तियों ने मेरी कविता में चार चाँद लगा दिए हैं | आपलोगों का प्रोत्साहन इस कलम की धार को और तेज करता है , पुनः आभार !

mparveen के द्वारा
February 26, 2012

नीलम जी नमस्कार, पहली बार आपकी रचना पढ़ी है . आपकी रचना के अंदर जो पंक्तियाँ हैं उनके भाव इतने सुंदर हैं की बस क्या कहें ” बहुत सुंदर” … जनतंत्र का खो जाना कोई मामूली घटना नहीं है जिस जनतंत्र को हमने अपने लहू का घूँट पिलाकर पाला है उसे यूँ ही खोने नहीं देंगे खुदाओं से कहो , वक्त है संभल जाएँ स्वर्ग की सुकोमल शय्या पर हम उन्हें और सोने नहीं देंगे | वन्दे मातरम !!!

    neelamsingh के द्वारा
    February 26, 2012

    परवीन जी प्रतिक्रिया के लिए विनत आभार ! आपको मेरी रचना अच्छी लगी यह मेरा सौभाग्य है | वन्दे मातरम !

shashibhushan1959 के द्वारा
February 26, 2012

आदरणीय नीलम जी, सादर ! आग उगलती इस ज्वलंत रचना पर मेरा हार्दिक नमन ! “तीक्ष्ण नुकीली नोक कलम की, चैन नहीं लेने देगी ! मधुर-भयंकर-कोमल चीखें, आँख नहीं लगने देंगी ! मौके पर यह कलम हमारी, तोप-तीर-तलवार बने ! जादू इसका पुनः जगे, भ्रष्टों के हित अंगार बने !! आदरणीय नीलम जी, आपको और आपकी अंगार बोती लेखनी को पुनः नमन !!

    neelamsingh के द्वारा
    February 26, 2012

    आदरणीय शशि भूषण जी , सादर अभिवादन ! प्रतिक्रिया में लिखी आपकी पंक्तियों ने दिनकर जी की याद दिला दी , यह देखकर , जानकार अच्छा लगा कि जो कलम आपके हाथ में है वही मेरे हाथ में भी है यानी हमारी कलमें झुकने वाली नहीं , जय भारत जय भारती !

nishamittal के द्वारा
February 26, 2012

आपकी रचना की प्रशंसा के लिए शब्द नहीं है,नीलम जी. बताइए , छटपटाती आत्मा का दर्द लेकर वह आदमी कहाँ जाए जो बिकाऊ नहीं है ? जिसके अनुत्तरित और आहत प्रश्नों की प्रतिध्वनि लौटकर वापस आ जाती है हर बार , वह कलम क्या करे ?बहुत प्रभावी पंक्तियाँ

    neelamsingh के द्वारा
    February 26, 2012

    आदरणीय निशा जी , प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ! आप जैसे गुणीजनों का आशीर्वाद बना रहे यही कामना है |

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 26, 2012

आदरणीय नीलम जी, सादर प्रणाम मंच पर नया हूँ और आपको प्रथम प्रतिक्रया दे रहा हूँ बहुत ही झुझारू कविता आपकी और प्रश्नों से भरी हुई उतर में देता हूँ “जनतंत्र हमारा सोया है वो दुह:स्वप्नों में खोया है, हम चीख-चीख चिल्लाते है, अपनी पीड़ा बतलाते है, वो सभी की चीखें सुन है रहा, अन्दर-अन्दर ही गम है सहा व्रण लगा है उसके सिने में, हमको किंचित भी नहीं दिखता हम लोभी है जो कोष रहें, क्यूँ कोई उसे नहीं सुनता अब देखो हमको ही उसको, इस हाल से बाहर लाना है इस सोये हुए जनतंत्र को अब, कुछ दवा-दारु करवाना है वो उठेगा जब धर रौद्र रूप, फिर कहाँ कोई बच पायेगा जो सीना ठोके लुट रहा, वो केवल गच्चा खायेगा” आभार सहित सुन्दर कविता के लिए आपको बधाई

    neelamsingh के द्वारा
    February 26, 2012

    आनंद जी प्रतिक्रिया के लिए आभार ! आपने अपनी काव्य पंक्तियों के माध्यम से मेरे प्रश्नों का सटीक उत्तर दिया है | समस्याओं का हल हमें ही ढूँढना है , कविता के अंतिम अंश में मैंने भी यही कहा है | हमारी सचेतनता एक नई सुबह लेकर जरूर आएगी |

    February 26, 2012

    saadar namaskar! बताइए , छटपटाती आत्मा का दर्द लेकर वह आदमी कहाँ जाए जो बिकाऊ नहीं है ….इंसानियत की दर्द को बयाँ करती हुई पंक्ति, हमें शर्मसार करती है,,,,,,,बहुत खुब्म हार्दिक आभार.

jlsingh के द्वारा
February 26, 2012

आदरणीय नीलम जी, सादर अभिवादन! काफी दिनों बाद आपकी कविता पढ़ा …… आपने सारा दर्द और मन का गुब्बार निकाल कर रख दिया …….. कुछ पंक्तिया जो मुझे स्तब्ध कर गयी और जिसे लिखने का साहस बहुत कम लोगों को होता है. राजनीति वेश्या बन गई , कुर्सियाँ सर्वोच्च लक्ष्य “भांडों” ने संभाली न्यायपालिका | महामहिम ! बताइए , छटपटाती आत्मा का दर्द लेकर वह आदमी कहाँ जाए जो बिकाऊ नहीं है ? साभार! — जवाहर.

    neelamsingh के द्वारा
    February 26, 2012

    आदरणीय जवाहर सिंह जी , सादर अभिवादन ! तीस वर्षों से मेरी प्रश्नाकुल कलम ऐसे ही सवाल पूछे जा रही है हो सकता है पाश और हाशमी जैसा हश्र मेरा भी हो पर मुझे इस बात की चिंता नहीं | लिखेंगे वही जो सच है अंजाम जो भी हो | प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

sadhanathakur के द्वारा
February 25, 2012

नीलम जी ,बहुत दिन बाद आपका मंच पर स्वागत है ,बहुत ही अच्छी रचना …………बधाई हो …..

    neelamsingh के द्वारा
    February 26, 2012

    साधना जी सद्भावना के लिए विनत आभार !

Santosh Kumar के द्वारा
February 25, 2012

आदरणीय दीदी जी ,.सादर प्रणाम बहुत दिनों बाद आपकी वेदना भरी रचना मंच पर देखकर अच्छा लगा .. वाह कलम क्या करे ?…यही वेदना कलम को खामोश करने के लिए काफी है ..सादर आभार सहित

    neelamsingh के द्वारा
    February 26, 2012

    संतोष भाई , प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ! देश की दुर्दशा पर , जनतंत्र की हत्या पर मेरे मन में आक्रोश है , आंतरिक वेदना की अनुभूति भी होती है पर ये कलम तो आखिरी साँस तक चलती रहेगी | इसे खामोश करना बड़ा मुश्किल है |


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