ye juban mujh se see nahin jaati ...

Just another weblog

3 Posts

59 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 4699 postid : 84

शिक्षा की अनूठी हाट

Posted On: 6 Dec, 2011 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

भेड़ों की पाठशाला में
गधे गुरु पढ़ा रहे हैं पाठ
विद्वान् मनीषी बुहार रहे हैं आँगन
खोमचेवालों ने वेदों , उपनिषदों के
पन्नों से बना लिया है ठोंगा
बेच रहे हैं माल |
ऋषि भूमि स्तब्ध है
नई शिक्षा प्रणाली पर
कौए , हंस , सिंह , बंदर
सब बैठे हैं एक कतार में
योग्यता , क्षमता है ताक पर
मिलेंगे सबको हर सत्र में
एक जैसे प्रमाण पत्र
बैल लिख रहे हैं सन्दर्भ ग्रन्थ
हो रहा है इतिहास का कायापलट
संस्कृति विदेशी पार्लरों में जाकर
करवा रही है ” मेकओवर ”
” आउटडेटेड ” होने के भय ने
बना दिया है उसे ” माड ”
पाठशाला के संस्थापक
कालिदास और तुलसी से
भरवा रहे हैं पानी
दो कौड़ी की भाषाएँ
नहीं रहीं शिक्षा का माध्यम
शेक्सपियर की गोदी में लेटकर वेदव्यास
सुन रहे हैं ” मर्चेंट आफ वेनिस ” की कहानी
” कबीर ” ने बैठा लिया है ” कीट्स ” को कन्धों पर
गधों ने बढ़ा दिया है देश का गौरव
लगी हुई है शिक्षा की अनूठी हाट
आर्यावर्त की नैया लग गई है
पश्चिम के घाट |

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 4.33 out of 5)
Loading ... Loading ...

25 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
January 22, 2012

कृपया इसे भी पढ़े– आयुर्वेदिक दिनेश के दोहे भाग-2 http://dineshaastik.jagranjunction.com/

dineshaastik के द्वारा
January 13, 2012

विचारणीय एवं जन जागृति लाने वाली रचना निश्चित ही सराहनीय…….

abodhbaalak के द्वारा
December 9, 2011

नीलम जी पाठशाल और कान्वेंट को आपने बड़ी सुन्दरता के साथ ………… वैसे आपने अपनी कई साडी पोस्ट डिलीट क्यों कर दी, जहाँ तक मुझे याद है आपकी बहुत सारी …………. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    neelamsingh के द्वारा
    December 11, 2011

    प्रतिक्रिया के लिए आभार ! अपनी पोस्ट डिलीट करने का कारण मैं बताना तो नहीं चाहती थी पर आपने पूछा है और कई लोगों ने पहले भी पूछा था तो बताना मुनासिब समझती हूँ | जे . जे . से मैं आदरणीय आर . एन , शाही जी के कहने से जुड़ी | मुझे यहाँ सबका भरपूर प्यार भी मिला , उत्साह बना रहा और मैं लिखती रही पर ब्लागर आफ द वीक बनने के बाद मैंने नोटिस किया कि सबने रचनाओं की रेटिंग करनी बंद कर दी , सराहना मिलती रही पर ये बात मन को कचोटती थी एक दिन उसी मनःस्थिति में मैंने सारी रचनाएँ डिलीट कर दी | मेरा निर्णय सही नहीं था जानती हूँ पर अब कुछ किया नहीं जा सकता | मैं चाहकर भी व्यस्तता के कारण दूसरों की रचनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं दे पाती थी कारण यह भी हो सकता है |

nishamittal के द्वारा
December 8, 2011

नीलम जी मंच पर बहुत समय पश्चात आपकी शिक्षा के क्षेत्र में मची अफरातफरी ,भ्रष्ट व्यवस्था पर व्यंग्य के रूप में प्रस्तुत रचना के लिए धन्यवाद.

    neelamsingh के द्वारा
    December 11, 2011

    निशा जी सराहना के लिए आभारी हूँ | थोड़े अंतराल के पश्चात् आने से पाठकों की रचना के प्रति उत्सुकता बनी रहती है | आपके लेखन में जो गहराई और परिपक्वता झलकती है उसकी मैं कायल हूँ | अभी तो मुझे आप जैसे गुरुजनों से बहुत कुछ सीखना है | आशा है आपलोगों का स्नेह यूँ ही मिलता रहेगा |

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 7, 2011

आदरणीय नीलम जी …..सादर अभिवादन ! शिक्षा को रोजगार से जोड़ना ही बहुत सी समस्याए हल कर देगा …..फिर भाषा कोई भी हो –उस पर न तो मुझको कोई ऐतराज है और न ही आपति ….. शुभकामनाये और मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    neelamsingh के द्वारा
    December 11, 2011

    राजकमल जी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद | सिर्फ रोजगार का मिल जाना ही सारी समस्याएँ हल कर देगा ऐसा मैं नहीं मानती हूँ | अंग्रेजों ने जो शिक्षा नीति हमारे लिए गढ़ी थी और जिसका अनुकरण हम आज भी कर रहे हैं वो क्लर्कों और बाबुओं की जमात पैदा करने के लिए बनाई गई थी | अपनी भाषा और संस्कृति खोकर हम किस गर्त में गिरेंगे ये तो वक्त ही बताएगा |

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
December 7, 2011

गधों ने बढ़ा दिया है देश का गौरव लगी हुई है शिक्षा की अनूठी हाट आर्यावर्त की नैया लग गई है पश्चिम के घाट | सुन्दर रचना व्यंग्य से भरी ..आज के शिक्षा के गिरते हुए स्तर को दिखाती हुयी ,,,,अब संस्कृति का मोल कहाँ सब कुछ बाजारू ….. भ्रमर ५

    neelamsingh के द्वारा
    December 11, 2011

    भ्रमर जी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ | आपने ठीक कहा है जब हर चीज बिकाऊ है तो संस्कृति और भाषा कैसे बची रह सकती है ?

rahulpriyadarshi के द्वारा
December 7, 2011

बहुत गहरे भाव हैं आपके इस कवित्त में,जितने शब्द हैं,उससे कहीं ज्यादा गहरे उनके अर्थ है,इस रचना के सृजन हेतु आपकी भूरि भूरि सराहना करता हूँ.

    neelamsingh के द्वारा
    December 11, 2011

    राहुल जी भावानुभूतियों को साझा करने के लिए आभार |

Abdul Rashid के द्वारा
December 7, 2011

नीलम जी नमस्कार आइना हकीक़त का बेहतरीन प्रस्तुति http://singrauli.jagranjunction.com

    neelamsingh के द्वारा
    December 11, 2011

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

allrounder के द्वारा
December 7, 2011

नीलम जी नमस्कार, कुकुरमुत्तों के पेड़ से पैदा होते स्तरविहीन शैक्षिक संस्थानों पर करारा प्रहार करती रचना पर हार्दिक बधाई आपको !

    neelamsingh के द्वारा
    December 11, 2011

    सद्भावना के लिए आभारी हूँ |

alkargupta1 के द्वारा
December 7, 2011

देश की दशा का बहुत ही सुन्दर व सटीक चित्रण किया है….पाश्चात्य संस्कृति के अन्धानुकरण में अपनी भारतीय संस्कृति किस अँधेरे गर्त में धकेली जा रही है जहाँ अपनी पहचान ही नहीं रह गयी है…….

    neelamsingh के द्वारा
    December 11, 2011

    अलका जी प्रतिक्रिया के लिए आभार ! काश हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को संभाल पाते |

vinitashukla के द्वारा
December 7, 2011

विद्वान् मनीषी बुहार रहे हैं आँगन खोमचेवालों ने वेदों , उपनिषदों के पन्नों से बना लिया है ठोंगा बेच रहे हैं माल | आज के समय में शायद ही किसी पढ़े लिखे इंसान को हमारे प्राचीन ग्रंथों के बारे में कोई ज्ञान होगा. लॉर्ड मैकाले का भूत अभी तक लोगों के सिरों पर मंडरा रहा है. देश की अपनी प्राथमिकताओं को नकारकर, शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में, पाश्चात्य मानदंडों का अन्धानुकरण करना निःसंदेह दुर्भाग्यपूर्ण है. अपनी पहचान, अपनी अस्मिता खोकर आखिर हमारा अस्तित्व ही क्या रहेगा? कविता के माध्यम से, बीमार मानसिकता पर करार प्रहार. बहुत बहुत बधाई.

    neelamsingh के द्वारा
    December 11, 2011

    विनीता दी मनोबल बढ़ाने के लिए आभार | मैं आपकी बात से सहमत हूँ | अपनी माँ और मातृभाषा की जगह कोई विदेशी घुसपैठिया हममें अपने भारतीय संस्कार कैसे डाल सकता है ?

shashibhushan1959 के द्वारा
December 7, 2011

आदरणीय नीलम जी, सादर. “नीलमजी क्या खूब आइना दिखलाया है, बहुत भयावह चेहरा इसमें उभर रहा है. कर पश्चिम की नक़ल हमारी बिगड़ी संस्कृति, पश्चिम हमको देख – देख कर सुधर रहा है. . दूर बज रहा ढोल सुहाना ही लगता है, जाने पर नजदीक पोल सब खुल जाता है, चाहे जितना मेक-अप कोई करे भयंकर, छीटा जल का पड़ते ही वह धुल जाता है. . आपकी रचना ने इनकी पोलपट्टी खोलकर रख दी है.

akraktale के द्वारा
December 7, 2011

नीलम जी नमस्कार, बिगडती व्यवस्था पर जबरदस्त चोट करती सुन्दर रचना,बधाई.

Santosh Kumar के द्वारा
December 7, 2011

आदरणीय नीलम दीदी ,.सादर नमन वासुदेव जी की बात से पूरा सहमत हूँ ,..बुनियाद ही चरमरा गयी तो पतन तो होगा ही … वेदना को आपने बहुत ही बढ़िया व्यक्त किया है….. हार्दिक साधुवाद

sumandubey के द्वारा
December 6, 2011

नीलम जी नमस्कार , बहुत ही समसमायिक देश की दशा का वर्णन किया है —भरवा रहे हैं पानी दो कौड़ी की भाषाएँ नहीं रहीं शिक्षा का माध्यम शेक्सपियर की गोदी में लेटकर वेदव्यास सुन रहे हैं ” मर्चेंट आफ वेनिस ” की कहानी ” कबीर ” ने बैठा लिया है ” कीट्स ” को कन्धों पर गधों ने बढ़ा दिया है देश का गौरव लगी हुई है शिक्षा की अनूठी हाट आर्यावर्त की नैया लग गई है पश्चिम के घाट | आपका भी मेरे ब्लॉग पर स्वागत है.

vasudev tripathi के द्वारा
December 6, 2011

भारत की बिडम्बना का सम्पूर्ण व सटीक चित्रण आपकी इन पंक्तियों में उपलब्ध होता है. वस्तुतः भारत पतन का इतिहास ही तभी से आरम्भ है जब से भाषा व शिक्षा संक्रमित हुई…………


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran