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इस इन्तेहा की हद को बार - बार देखिये

Posted On: 18 Oct, 2011 में

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यूँ हो रहा है मौत का व्यापार देखिये
इन कातिलों के खंजरों की धार देखिये |
वे कर रहे हैं आपकी भी ज़िन्दगी के सौदे
है बिक रहा कफ़न भी बेशुमार देखिये |
अंजाम दे रहे जो हँस – हँस के हादसों को
वो हो रहे हैं कैसे शर्मसार देखिये |
नज़रों को अपने इस तरह न फेरिये जनाब
अब जो भी देखिये वो आर – पार देखिये |
लुटते रहेंगे कब तक , मिटते रहेंगे कब तक ?
इस इन्तेहा की हद को बार -बार देखिये

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

alkargupta1 के द्वारा
October 20, 2011

अति उत्तम कृति !

Lahar के द्वारा
October 20, 2011

आदरणीय नीलम जी नमस्कार बहुत खुबसूरत गजल … मौत का व्यपार और खंजरो की धार !!! वह क्या बात है | धन्यवाद |

Santosh Kumar के द्वारा
October 20, 2011

आदरणीय नीलम दीदी ,. …..”नज़रों को अपने इस तरह न फेरिये जनाब अब जो भी देखिये वो आर – पार देखिये | लुटते रहेंगे कब तक , मिटते रहेंगे कब तक ? इस इन्तेहा की हद को बार -बार देखिये..” नजरें फेरते रहेंगे तो बार बार मिटते ही रहेंगे ,…बहुत ओजस्वी रचना के लिए नमन आपको

jlsingh के द्वारा
October 19, 2011

वे कर रहे हैं आपकी भी ज़िन्दगी के सौदे है बिक रहा कफ़न भी बेशुमार देखिये | बहुत ही सुन्दर रचना! बधाई!

abodhbaalak के द्वारा
October 19, 2011

नीलम जी बस हम देख ही तो रहे हैं, और देख देख कर हमारी आत्मा ………. सुन्दर कविता के लिए बंधाई हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Abdul Rashid के द्वारा
October 19, 2011

लुटते रहेंगे कब तक , मिटते रहेंगे कब तक ? इस इन्तेहा की हद को बार -बार देखिये सुन्दर रचना बधाई http://singrauli.jagranjunction.com/

vinitashukla के द्वारा
October 19, 2011

जनचेतना को जगाती हुई सुन्दर और ओजपूर्ण कविता. बधाई.

nishamittal के द्वारा
October 19, 2011

नीलम जी सर्वप्थ्म तो आभार जागरण का जिसके सौजन्य से इतनी अच्छी रचनाएँ हमें मिलती हैं और फिर आपका रचना को हमारे लिए प्रस्तुत करने पर.

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
October 19, 2011

आदरणीया नीलम जी, सादर अभिवादन ! सत्यता को दर्शाती यथार्थवादी रचना ………बधाई !

राही अंजान के द्वारा
October 18, 2011

बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ नीलम जी…..हर आम आदमी की बेबसी को बयां करती हुई सी ! लुटते रहेंगे कब तक , मिटते रहेंगे कब तक ? इस इन्तेहा की हद को बार -बार देखिये !!!!!!! बहुत बहुत आभार !! . . जानना चाहूँगा कि क्या आपने अपना ब्लॉग अकाउंट नए सिरे से शुरू किया है ?? पिछली कोई भी पोस्ट नज़र नहीं आ रही !!

akraktale के द्वारा
October 18, 2011

नीलम जी नमस्कार, दिल की पीड़ा को आपने बहुत ही अच्छे शब्दों में बयाँ किया है. वे कर रहे हैं आपकी भी ज़िन्दगी के सौदे है बिक रहा कफ़न भी बेशुमार देखिये | साधुवाद.


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